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sanskrit 2022 -23

गणतंत्र दिवस

Republic Day

शिक्षा और दर्शन

शिक्षा और दर्शन का सम्बन्ध अन्योन्याश्रय है। शिक्षा-दर्शन दो शब्दों शिक्षा और दर्शन के योग से बना है।दर्शन जीवन के विभिन्न पक्षों को स्पर्श करता है और शिक्षा भी जीवन का म...

वर्तमान स्त्री शिक्षा

शासन निरंतर शिक्षा के प्रति जागरूक होता जा रहा है। भारत के स्त्री - पुरूष और बच्चे सभी शिक्षा ग्रहण करने हेतु तत्पर हो रहे हैं लेकिन किसे किसकी शिक्षा लेनी चाहिए, किसके लिए कौन सी राह उचित है ,इसका निर्णय नहीं हो पा रहा है। लक्ष्यहीन राही की भाँति जिसके जी में जिधर आता है वह उधर ही उड़ान मार रहा है। शिक्षा का युग होने पर भी घोर आश्चर्य है कि स्त्री-पुरूष किसीको अपने कर्तव्य का भान नहीं है। पथ का ज्ञान नहीं है। गम्भीरता से चिंतन करने पर यह तथ्य सामने आता है कि हमारी शिक्षा पद्धति ही ऐसी है,जिसने युवक युवतियों की पवित्र भावनाओं को नष्ट कर दिया है। हमारी शिक्षा पद्धति ने उन्हें शक्तिहीन बनाकर मानसिक गुलामी की बेड़ियों में जकड़ लिया है। उनके मस्तिष्क के लिए ऐसे विषय मिलते हैं, जो उनके व्यवहारिक और सार्वजनिक जीवन के लिए सर्वथा अनुपयुक्त हैं। सृष्टि के सृष्टिकर्ता विधाता अल्पज्ञ नहीं थे जिन्होंने स्त्री और पुरुषों में महत्वपूर्ण भेद उत्पन्न कर दिया। उनकी प्रकृति भिन्न बना दी। इस प्रकार जब आदिकाल से ही स्त्रियों के कार्य क्षेत्र सर्वथा पृथक हैं, फिर एक ही शिक्षा दोनों के लिए कैसे उपयोगी साब...

आधुनिक शिक्षाप्रणाली के दोष

नमस्कार मित्रो! शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य चरित्र-निर्माण करना है लेकिन आधुनिक शिक्षा अपने उद्देश्य के ठीक विपरीत असर दिखा रही है।  वर्तमान सामाजिक उथल-पुथल का एक बड़ा ...

नारी की महत्ता

नमस्कार मित्रो! आज वर्तमान विश्व नारी समाज की महत्ता को बड़ी कठिनाई से स्वीकार कर रहा है।यह स्थिति दुःखद है। विश्व को परम् वैभव तक पहुँचाने हेतु हमे नारी की महत्ता को सहर्ष स्वीकार करना होगा। नर वपन कर सकता है परंतु सृजन की शक्ति उसमें नहीं है। नारी(प्रकृति)के आभाव में पुरूष पंगु है। शक्ति के बिना शिव शव-समान हैं। ब्रह्मा सृष्टि करने चले, बहुत-सी मानसिक सृष्टि कर डाली, कोई उत्साह नहीं, वृद्धि की कोई आशा नहीं। नीरस नर कर ही क्या सकता है। सूखे आटे में जल न पड़े ,सरस न हो,तबतक रोटी नहीं बन सकती। ब्रह्मा हताश हुए।अब क्या करें।अंत में ब्रह्मा के दो रूप हो गए। एक से नारी दूसरे से नर।दोनों में कोई अंतर नहीं, छोटे बड़े का भेद  नहीं। परन्तु एक बात ध्यान देने योग्य ह,ै ब्रह्मा के नारी रूप में मृदुलता,सौम्यता, सुकुमारता, मादकता, धैर्य, क्षमा,वशीकारिता, सुंदरता,सरसता,त्याग तथा आकर्षण नर से अधिक हुआ। तब जाकर सृष्टि की वृद्धि आरम्भ हुई।यदि नारी न होती तो सृष्टि कभी नहीं होती। शास्त्रों में भगवान को माता तथा पिता दोनों कहा गया है। ईश्वर का मातृरूप और पितृरूप दोनों ही है लेकिन संतान का जितना स्न...

साम्प्रदायिकता और हिंदुत्व

नमस्कार मित्रों! दुर्भाग्य से हिंदुत्व और साम्प्रदायिकता दोनों पर्यायवाची शब्द बन चुके हैं। आज अधिकांश भारतीय और संसार के प्रमुख व्यक्ति, जो हिंदुत्व को नहीं समझ पाये ...

भारतीय संस्कृति में षोडश मातृका

नमस्कार मित्रो! आज आप सब भारतीय संस्कृति में पूजित होने वालीं सोलह देवमाता तथा सोलह लोकमताओं के बारे में जानेंगे।इन्हें भारतीय संस्कृति में षोडश मातृका के नाम से जाना जाता है। हमारा जीवन केवल जन्म देनेवाली माता से नहीं बनता।हमारे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में माताओं की अलग अलग भूमिका होती है। इस लेख के माध्यम से आप जानेंगे कि हमारे जीवन को प्रकाशित करने के लिए निज जीवन को बाती की तरह जलाने वाली माताएँ कौन हैं। साथ ही देवमताओं के बारे में भी जानेंगे जिनकी पूजा के बिना हिंदुओं का कोई मांगलिक कार्य पूर्ण नहीं होता। भारतीय संस्कृति में माता का स्थान सबसे ऊँचा है। ब्रह्मा,विष्णु तथा महेश भी मातृ स्नेह पाने की इच्छा रखते हैं। भारतीय संस्कृति में षोडश मातृका पूजन की परंपरा वैदिक है । पुराणों ने भी षोडश मातृका(सोलह माताओं) की स्तुति की है। ये षोडश मातृकाएँ जन्म से मृत्यु तक मनुष्य के जीवन में अलग-अलग भूमिकाओं का निर्वहन करतीं हैं। अतः ये माताएँ पूज्या होती हैं। तो आइए सबसे पहले जानते हैं षोडश(सोलह) देवमताएँ कौन-कौन सी हैं-

राम और कृष्ण चरित

श्रीकृष्ण तथा श्रीराम भारतीय संस्कृति के दो आधार स्तम्भ है। इनका नाम अति श्रद्धा और आदर के साथ लिया जाता है। दोनों ही विष्णु के अवतार माने जाते हैं। परंतु राम और कृष्ण के स...

हवन विधि और वेदी निर्माण

यज्ञ प्रधान भारतीय संस्कृति में हवन का महत्वपूर्ण स्थान है। देवता हवन के द्वारा ही पुष्ट होकर मनुष्यों की कामनाएँ पूरी करते हैं। हवन पूर्णतया वैज्ञानिक प्रक्रिया है तथा हवन हमारी प्रकृति के लिए भी अनिवार्य है।हमें नियमित हवन करना चाहिए क्योंकि यह नकारात्मक प्रभावों को समाप्त करने का सबसे अच्छा तरीका माना गया  है । हवन की अग्नि में डाली गई प्रत्येक आहूति देवताओं को प्राप्त होती है। तो आइये जानते हैं संक्षिप्त हवन विधि और वेदी निर्माण के बारे में। यह पोस्ट उन सभी व्यक्तियों के लिए लाभदायक होगा जो  जानकारी के अभाव में स्वयं हवन नहीं कर पाते हैं। इस पोस्ट के द्वारा शास्त्रीय रीति से नित्य हवन विधि और वेदी निर्माण के बारे में जानकारी प्राप्त हो सकती है।

प्रणाम क्यों और कैसे ?

भारतीय संस्कृति में सर्वत्र प्रणाम करने की महिमा बताई गई है। वेदों ,पुराणों,उपनिषदों तथा अन्य धर्म शास्त्रों में प्रणाम और उसके महत्व का विशद वर्णन भरा पड़ा है।प्रणाम या ...